क़ुरआने मजीद अहले बैत-4 Quran Majeed Ahle Bait -4
29- “وَبِالْأَسْحَارِ هُمْ يَسْتَغْفِرُونَ”(ज़ारियात 19)
यह आयत अली, फ़ातेमा और हसनैन के बारे में नाज़िल हुई है।(इब्ने अब्बास)(शवाहीदुत तनज़ील जिल्द 2 पेज 195)
30- “مَرَجَ الْبَحْرَيْنِ يَلْتَقِيَانِ”(रहमान 20)
(الْبَحْرَيْنِ) अली व फ़ातेमा(اللُّؤْلُؤُ وَالْمَرْجَانُ) हसन व हुसैन हैं।(इब्ने अब्बास) (दुर्रे मनसूर जिल्द 6 पेज 142)
31- “وَالسَّابِقُونَ السَّابِقُونَ”(वाक़ेया 11)
यह अली(अ) और उनके शिया हैं।(रसूले अकरम(स)(शवाहीदुत तनज़ील जिल्द 2 पेज 216)
32- “وَأَصْحَابُ الْيَمِينِ مَا أَصْحَابُ الْيَمِينِ”(वाक़ेया 28)
हम और हमारे शिया असहाबे यमीन हैं।(इमाम बाक़िर(अ)( शवाहीदुत तनज़ील जिल्द 2 पेज 293)
33- “هُوَ الَّذِي أَرْسَلَ رَسُولَهُ بِالْهُدَى وَدِينِ الْحَقِّ لِيُظْهِرَهُ عَلَى الدِّينِ كُلِّهِ وَلَوْ كَرِهَ الْمُشْرِكُونَ”(सफ़ 10)
इसका मिसदाक़ ज़हूरे क़ाएम के वक़्त सामने आयेगा।(इमाम जाफर सादिक़(अ)( यनाबीऊल मवद्दत पेज 508)
34- “إِنَّ هَذِهِ تَذْكِرَةٌ فَمَن شَاءَ اتَّخَذَ إِلَى رَبِّهِ سَبِيلًا”(मुज़म्म्ल 20)
जिसने मुझसे और मेरे अहलेबैत से तमस्सुक किया उसने ख़ुदा का रास्ता इख़्तेयार कर लिया।(रसूले अकरम(स))(सवाएक़े मोहरेक़ा पेज 90)
35- “.............هَلْ أَتَى عَلَى الْإِنسَانِ حِينٌ مِّنَ الدَّهْرِ لَمْ يَكُن شَيْئًا مَّذْكُورًا”(दहर 1- 32)
यह सूरह अहलेबैत की शान में नाज़िल हुआ है।(और साएल जिबरईल थे जिनके ज़रीये क़ुदरत ने अहलेबैत का इम्तेहान लिया था।)(इब्ने अब्बास)( तफ़सीरे क़ुरतुबी, ग़ायतुल मराम पेज 368)
36- “وَوَالِدٍ وَمَا وَلَدَ”(बलद 3)
अली(अ) और औलादे अली मुराद हैं।(इमाम मुहम्मद बाक़िर(अ)( शवाहीदुत तनज़ील जिल्द 2 पेज 331)
37- “..........وَالشَّمْسِ وَضُحَاهَا”(शम्स 1-4)
(َالشَّمْسِ) रसूले अकरम,( الْقَمَرِ) अली,( النَّهَارِ) हसनैन (اللَّيْلِ) बनी ऊमय्या हैं।(इब्ने अब्बास)( शवाहीदुत तनज़ील जिल्द 2 पेज 333)
38- “وَالتِّينِ وَالزَّيْتُونِ”(तीन 1-8)
(وَالتِّينِ وَالزَّيْتُونِ) हसन व हुसैन, (وَطُورِ سِينِينَ) अमीरूल मोमीनीन(अ) (الْبَلَدِ الْأَمِينِ) रसूले अकरम(स) हैं।(इमाम मूसा काज़िम(अ)( शवाहीदुत तनज़ील)
39- “إِنَّ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ أُوْلَئِكَ هُمْ خَيْرُ الْبَرِيَّةِ”(बय्येना 8-9)
आले मुहम्मद(خَيْرُ الْبَرِيَّةِ) हैं।(रसूले अकरम(स)( शवाहीदुत तनज़ील जिल्द 2 पेज 364)
40- “إِنَّا أَعْطَيْنَاكَ الْكَوْثَرَ”(कौसर 1)
कौसर हम अहलेबैत की मंज़िले जन्नत का नाम है।(रसूले अकरम(स)( शवाहीदुत तनज़ील जिल्द 2 पेज 376)
